30 मई आते ही पत्रकारिता के सम्मान में बड़े-बड़े शब्द गूंजने लगते हैं। पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, उनके योगदान की प्रशंसा की जाती है, लेकिन 24 घंटे बाद सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है।
सवाल यह है कि जिस पत्रकार को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, क्या उसे वास्तव में वह सम्मान, सुरक्षा और अधिकार मिले हैं, जिनका वह हकदार है?
आज देश का पत्रकार दोहरी लड़ाई लड़ रहा है। एक तरफ सच को सामने लाने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ दबाव, धमकी, मुकदमे, आर्थिक असुरक्षा और राजनीतिक हस्तक्षेप का बोझ। जो पत्रकार जनता की आवाज बनता है, उसकी अपनी आवाज सुनने वाला अक्सर कोई नहीं होता।
जमीनी स्तर पर काम करने वाले हजारों पत्रकार बिना बीमा, बिना सुरक्षा और बिना स्थायी आय के काम कर रहे हैं। खबर गलत होने पर सबसे पहले पत्रकार कटघरे में खड़ा किया जाता है, लेकिन खबर जुटाने के दौरान उस पर होने वाले हमलों पर कितने लोग आवाज उठाते हैं?
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता को बढ़ावा देने वालों को मंच और पुरस्कार मिल जाते हैं, जबकि सत्ता से सवाल पूछने वाले पत्रकारों को कई बार अकेला छोड़ दिया जाता है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन है। यह उन सवालों को उठाने का दिन है जिनसे अक्सर व्यवस्था बचती रही है।
जब तक पत्रकार भयमुक्त नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा।
जब तक पत्रकार सुरक्षित नहीं होगा, तब तक जनता की आवाज सुरक्षित नहीं होगी।
और जब तक सच बोलने वाली कलम पर दबाव रहेगा, तब तक लोकतंत्र की तस्वीर अधूरी रहेगी।
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस पर न्यूज़ टाइम्स झारखंड उन सभी पत्रकारों को सलाम करता है जो तमाम दबावों, अभावों और खतरों के बीच भी सच दिखाने का साहस रखते हैं।
याद रखिए, लोकतंत्र की सबसे मजबूत दीवार संसद नहीं, न्यायालय नहीं, बल्कि वह निर्भीक कलम है जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखती है।
बिलकुल सही बात है अविनाश, यहाँ सच्चाई दिखाना बहुत ही महंगी है। जिसकी भी कोई गलत बात की सच्चाई हो, लोग उसकी जानकारी चाहते हैं,मगर बात पत्रकारों पे हमले की सुने तो साथ कोई नहीं देता।
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